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दक्षिण-पश्चिम (South-West) प्रवेश वाले मकान: वास्तु के दृष्टिकोण से एक गंभीर वास्तविकता

वास्तु शास्त्र में प्रत्येक दिशा का अपना विशिष्ट ऊर्जा-स्वभाव माना गया है। इन्हीं दिशाओं में दक्षिण-पश्चिम, जिसे नैऋत्य कोण कहा जाता है, जीवन में स्थिरता, नियंत्रण, सुरक्षा, संचित धन और परिवार के मुखिया की भूमिका से जुड़ी मानी जाती है। वास्तु के अनुभवजन्य अध्ययन और वर्षों की प्रैक्टिस में यह बार-बार देखा गया है कि जिन मकानों का मुख्य प्रवेश दक्षिण-पश्चिम दिशा में होता है, वे सामान्यतः शुभ परिणाम नहीं देते। विशेष रूप से जब प्रवेश S6, S7, S8 अथवा W1 जैसी एंट्रेंस श्रेणियों में आता है, तो वहाँ की ऊर्जा स्वभावतः नकारात्मक हो जाती है।


दक्षिण-पश्चिम प्रवेश वाले मकानों का सबसे पहला प्रभाव व्यक्ति के आर्थिक जीवन पर दिखाई देता है। ऐसे घरों में रहने वाले लोग मेहनत तो निरंतर करते हैं, परंतु उस मेहनत का प्रतिफल स्थायी नहीं रहता। आय के साधन बने रहते हैं, लेकिन धन टिकता नहीं है। बचत बन पाना कठिन हो जाता है और बार-बार ऐसे खर्चे सामने आते हैं जो पूरी वित्तीय योजना को असंतुलित कर देते हैं। समय के साथ यह स्थिति व्यक्ति या परिवार को आर्थिक रूप से नीचे की ओर धकेल देती है, जहाँ जीवन स्तर गिरता चला जाता है।


इन मकानों में रहने वाले लोगों के जीवन में परिश्रम और परिणाम के बीच एक असमानता देखी जाती है। प्रयास लगातार होते हैं, लेकिन कार्यों में रुकावटें बनी रहती हैं। पदोन्नति रुक जाती है, व्यवसाय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाती और लिए गए निर्णय अक्सर गलत सिद्ध होते हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर करती है और मानसिक थकान, हताशा तथा निराशा को जन्म देती है।


दक्षिण-पश्चिम प्रवेश का प्रभाव सामाजिक जीवन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। व्यक्ति स्वयं को समाज और रिश्तों से कटता हुआ महसूस करने लगता है। मित्रों और रिश्तेदारों से दूरी बढ़ने लगती है और परिवार के भीतर भावनात्मक ठंडापन आ जाता है। घर, जो सामान्यतः सुरक्षा और सुकून का स्थान माना जाता है, धीरे-धीरे मानसिक बोझ और अकेलेपन का केंद्र बन जाता है।


पारिवारिक स्तर पर भी ऐसे मकानों में असंतुलन देखने को मिलता है। दक्षिण-पश्चिम दिशा नियंत्रण और अधिकार से जुड़ी मानी जाती है, और जब यही दिशा प्रवेश बन जाती है, तो घर के भीतर अधिकार को लेकर टकराव की स्थिति बनने लगती है। पति-पत्नी के संबंधों में तनाव बढ़ता है, निर्णयों पर सहमति नहीं बन पाती और परिवार के मुखिया की भूमिका कमजोर होती चली जाती है। इससे पूरे परिवार की स्थिरता प्रभावित होती है।


स्वास्थ्य के स्तर पर भी दक्षिण-पश्चिम प्रवेश वाले मकानों के दीर्घकालिक प्रभाव देखे गए हैं। ऐसे घरों में रहने वाले लोगों में पुरानी बीमारियाँ, जोड़ों और कमर से संबंधित समस्याएँ, नसों से जुड़े रोग तथा मानसिक तनाव और अवसाद की प्रवृत्ति बढ़ती हुई पाई गई है। कई मामलों में उपचार लंबे समय तक चलता है, पर पूर्ण राहत नहीं मिल पाती।


कुछ गंभीर मामलों में यह भी देखा गया है कि इस प्रकार के मकानों में अचानक बड़े संकट सामने आते हैं। गंभीर बीमारियाँ, दुर्घटनाएँ या परिवार के किसी सदस्य की असमय मृत्यु जैसी घटनाएँ घर के वातावरण को गहरे शोक और भय में बदल देती हैं। यद्यपि हर मामले में ऐसा हो, यह आवश्यक नहीं, परंतु जोखिम की संभावना को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता।


वास्तु विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण-पश्चिम प्रवेश से जुड़ी समस्याओं को केवल सतही जानकारी के आधार पर नहीं समझा जा सकता। आजकल लोग इंटरनेट, यूट्यूब वीडियो या सामान्य लेख पढ़कर स्वयं निर्णय ले लेते हैं, जो कई बार स्थिति को और अधिक जटिल बना देता है। हर मकान की ऊर्जा संरचना अलग होती है और हर दक्षिण-पश्चिम प्रवेश एक-सा प्रभाव नहीं देता।


दक्षिण-पश्चिम प्रवेश वाला मकान केवल दिशा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह जीवन की आर्थिक स्थिरता, मानसिक संतुलन, स्वास्थ्य और पारिवारिक सुरक्षा से गहराई से जुड़ा विषय है। इसे हल्के में लेना भविष्य में गंभीर परिणामों का कारण बन सकता है। यही कारण है कि इस विषय को केवल आस्था नहीं, बल्कि गहन अध्ययन और अनुभव की दृष्टि से समझा जाना आवश्यक है।


Dr. Rohit Guptaa

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